बन गई है तू -दुष्यन्त कुमार

एक आदत सी बन गई है तू,
और आदत कभी नहीं जाती ।

दर्दे दिल वक्त को पैग़ाम भी पहुँचाएगा,
इस क़बूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो ।
कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो ।
(सूराख=छेद)

तुम कहीं पर झील हो, मैं एक नौका हूँ,
इस तरह की कल्पना मन में उभरती है ।

सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की असलियत,
हर किसी के पास तो एसी नज़र होगी नहीं ।

चट्टानों पर खडा़ हुआ तो छाप रह गई पाँवों की,
सोचो कितना बोझ उठाकर मैं इन राहों से गुज़रा ।

मैं ठिठक गया था लेकिन तेरे साथ-साथ था मैं,
तू अगर नदी हुई तो मैं तेरी सतह रहा हूँ ।

तेरे सर पे धूप आई तो दरख़्त बन गया मैं,
तेरी ज़िन्दगी में अकसर मैं कोई वजह रहा हूँ ।
(दरख्त=पेड़)

इस अहाते के अँधेरे में धुँआ-सा भर गया,
तुमने जलती लकडियाँ शायद बुझाकर फेंक दी ।
(अहाता=बाडा़)

एक बूढा़ आदमी है मुल्क में या यों कहो-
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है ।

इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब कि सदक़े आपके,
जब से आज़ादी मिली है मुल्क में रमज़ान है ।

कल नुमाइश में मिला वो चीथडे़ पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है ।

कोई निजात के सूरत नहीं रही, न सही,
मगर निजात की कोशिश तो एक मिसाल हुई ।
(निजात=आज़ादी)

समुद्र और उठा, और उठा, और उठा,
किसी के वास्ते ये चाँदनी बबाल हुई ।

फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए,
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है ।

उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए ।

तू किसी रेल-सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ ।

एक बाजू उखड़ गया जब से,
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ ।

मैं तुझे भूलने की कोशिश में,
आज कितने करीब पाता हूँ ।

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार,
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार ।

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं,
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार ।
(शरीके जुर्म=अपराध में सामिल)

तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं ।

-दुष्यन्त कुमार
‘લયસ્તરો’ના સૉજન્યથી
http://layastaro.com/

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